Monday, July 27, 2020

16-6-20

[13:59, 7/10/2020] Baba 3: VCD 3279  प्रातः क्लास- 02.03.1968 
 व्याख्या ता. 16.06.2020 
समय:-00:00:10
प्रातः क्लास चल रहा था- 02 मार्च 1968, तीसरे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी कि ऊँचे-ते-ऊँचा बाबा, वो हमको पढ़ाते हैं और समझाते भी हैं, तो फिर बुद्धि में बैठता क्यों नहीं है? ऐसे ऊँचे-ते-ऊँचे बाबा को फारकती क्यों दे देते हैं? कहते हैं माया फारकती दिलाए देती है। तो यही लड़ाई है, उनको गिराए देती है और अपना बनाए लेती है। तो सबको कह दियो- देखो, तुम सतयुग में, त्रेता में और द्वापर के आदि में भी कितने साहूकार थे, कितने सम्पत्तिवान थे। अभी तुम कितने कंगाल बन गए। तो देखो, इस सृष्टि के आदि-मध्य-अंत की बेहद की बातें सुनाते हैं ना! बेहद की बात तो बेहद का बाप ही सुनाएँगे। हद का बाप तो लौकिक बाप, वो तो एक जन्म का बाप है। वो बेहद की बातें कैसे सुनाएँगे? और ये धर्मपिताएँ, ये भी तो कोई ऑलराउण्ड पार्टधारी नहीं हैं ना जो बेहद की बातें सुनाए! तो ये बेहद का बाप है। तुम पैसे खर्चा करके सब खत्म कर दिया जो बेहद के बाप ने प्रॉपर्टी तुमको दी। अभी तुम देखो कि तुमको मालूम ही नहीं है कि ये सभी जो भी थे देवताएँ, उन देवताओं की आत्माएँ सब अभी तमोप्रधान बनी पड़ी हैं। क्योंकि बहुत जन्म के अंत की बात हो गई। अभी बहुत जन्म के अंत में हैं। और बाबा ने तो बताया ना कि बहुत जन्म के अंत के भी अंत में मैं आता हूँ। तो फिर वो बहुत जन्म किसके, किसका कहें कि बहुत जन्मों का अंत? ज़रूर कहेंगे देवताओं का। कौन-से देवताओं का? अरे, वो ही देवताओं का जो अव्वल नम्बर पहले-2 इस सृष्टिरूपी रंगमंच पर अतिन्द्रिय सुख भोगते हैं। उनमें भी जो अव्वल नम्बर है उसके अंत की ही बात है- बहुत जन्मों के अंत के भी अंत में।
[13:59, 7/10/2020] Baba 3: VCD 3279  प्रातः क्लास- 02.03.1968 
 व्याख्या ता. 16.06.2020 
समय:-00:04:48
तो समझा बहुत जन्मों का अंत कब हुआ? कब कहें? अरे, बहुत जन्मों का अंत उस ऑलराउण्ड पार्टधारी का कब हुआ? (किसी ने इशारा किया) कलियुग अंत! कलियुग तो कितना 1250 वर्ष चलता है, अंत में कब? 1976 में अंत कहेंगे? 1976 में जन्म लेते हैं? जन्म माने प्रत्यक्षता रूपी जन्म। तो क्या प्रत्यक्षता हो जाती है? ब्रह्माकुमार-कुमारियों में प्रत्यक्षता हो जाती है? सब में हो जाती है? हाँ, ब्राह्मणों की दुनिया में भी प्रत्यक्षता नहीं होता और जो कहते हैं कि हम सन्मुख पढ़ाई पढ़ते हैं, उनको भी माया वायडोरा खिलाती है कि नहीं खिलाती है? तो सदाकाल कहें कि उनको प्रत्यक्ष हो गया, प्रत्यक्षता रूपी जन्म हो गया? अरे, बच्चा जन्म लेता है लौकिक दुनिया में भी, तो जन्म लेने के बाद वो बाहर आता है ना! गुप्त था फिर बाहर आया। तो अभी क्या कहें? अभी गुप्त है, गुप्त पार्टधारी है या बाहर की दुनिया में प्रत्यक्ष हो गया? प्रत्यक्ष तो नहीं हो गया। तो देखो, वो बहुत जन्म लेते गए, बाकी तो ये उनका है सतयुग आदि। तो जब सतयुग आदि होता है तो अंत भी होता होगा पुरानी दुनिया का। तो कौन-सा टाइम कहें? 76 तो नहीं कह सकते, 36 भी नहीं कह सकते। क्या कहे? वो तो 2028 में कहें,  2018 में कहें? अच्छा! 2018 में जिनके सामने पहले प्रत्यक्ष होता है, 2017 में वो हड़कंप होता है ना! उस 2018 में प्रत्यक्ष जिनके सामने होता है, तो वो भी, उनको भी माया सुलाती है कि नहीं? तो प्रत्यक्ष हुआ? प्रत्यक्ष हुआ? क्या कहेंगे? अरे, प्रत्यक्ष हुआ? हुआ? सोते रहते हैं? शिवबाबा पढ़ाई पढ़ाते रहते हैं और समझाते रहते हैं और सन्मुख बैठने वाले सोते रहते हैं, तो प्रत्यक्ष हुआ? क्या कहेंगे? हुआ? अरे, हुआ कि नहीं हुआ? नहीं हुआ। हाँ। सो देखो ऐसे नहीं कहेंगे कि सतयुग का आदि और कलियुग का अंत हुआ सारी दुनिया के लिए। नहीं। अरे, ब्राह्मणों की दुनिया के लिए भी अंत नहीं कहेंगे 2018 में, कहेंगे? 28 में? हाँ, 28 में ब्राह्मणों की दुनिया में तो प्रत्यक्ष होगा। तो वो ब्राह्मणों की दुनिया, भक्तिमार्ग की दुनिया हुई जिनके बीच प्रत्यक्ष होगा, भगत हए या ज्ञानी हुए? क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान पूरा पक्का बुद्धि में बैठ गया? बैठ गया? हाँ। क्षेत्र माना हाँ, अर्जुन का रथ, शरीर रूप रथ जिसमें प्रवेश करते हैं, प्रत्यक्ष होते हैं और क्षेत्रज्ञ माना उस अर्जुन के मुकर्रर रथ को इस सृष्टि में पहले-2 किसने जाना? वो ही हुआ अव्वल नम्बर क्षेत्रज्ञ। कौन हुआ? एक अक्षर लिखो, कौन हुआ? (किसी ने इशारा किया) आ, ‘आ’ माने क्या? ‘आ’ माने तो बहुत कुछ होता। हाँ, इस सृष्टि में पहले-2 शिव, उसके सामने प्रत्यक्ष होगा। क्यों? क्योंकि वो ही तो जानकार है। वो ऑलरेडी सदाकाल का त्रिकालदर्शी है कि कभी है, कभी नहीं है? सदाकाल का। प्रजापिता तो कभी है और कभी, कभी नहीं है।
[14:00, 7/10/2020] Baba 3: VCD 3279  प्रातः क्लास- 02.03.1968 
 व्याख्या ता. 16.06.2020 
समय:-00:10:06
तो वो, जिनको ये ज्ञान नहीं है, तो उनको भक्त कहेंगे कि ज्ञानी कहेंगे? भक्त हैं। तो वो भक्तिमार्ग के लिए ये बाकी चित्र बनाते हैं। भई त्रिमूर्ति का चित्र बनाओ! चाहे बेसिक ज्ञान वाले भगत हों, चाहे एडवांस ज्ञान वाले भगत हों, भई चित्र बनाओ! अब चित्रों की दरकार है, भक्तों को होती है या जिनकी लगन लग जाती है उनके लिए होती है? उनके लिए थोड़े ही होती है। उनके तो दिल में बस गया। नहीं? हाँ, बस जाता है। उन्हें तो चित्रों की दरकार ही नहीं। तो ये चित्र जो हैं भक्तिमार्ग के लिए बनाते हैं। ये ड्रामा के प्लैन अनुसार ये भक्तिमार्ग का चित्र बनाना-करना है। और ये सामग्री तो फिर ड्रामा प्लैन अनुसार बननी ही है। क्या? ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनिया में भी बननी है और जो भक्तिमार्ग का 2500 साल का टाइम होता है उसमें भी? उसमें भी बननी है और मनुष्य को भक्तिमार्ग द्वारा दुर्गति को पहुँचना ही है। 2500 वर्ष के भक्तिमार्ग में भी द्वापर-कलियुग में दुर्गति में पहुँचते हैं और बेसिक ज्ञान में जो भक्ति में चलते हैं, उनकी भी दुर्गति होती जाती है। और एडवांस जो कहते हैं कि हम एडवांस ज्ञानी हैं, एडवांस ज्ञान में चलते हैं, उनकी भी दुर्गति हो रही है कि सद्गति हो रही है? किसी की सद्गति हुई? कि अज्ञान नींद में सोए हुए हैं? सोए हुए हैं- ऐसे ही कहेंगे। तो दुर्गति से सद्गति में पहुँचना तो है। तो ये है ही भक्ति क्योंकि ज्ञान तो नहीं है कुछ भी। क्या ज्ञान? अरे, ज्ञान तो बताए दिया ना! अरे, गीता में भी बताए दिया, भक्तिमार्ग की गीता में, क्या? ज्ञान किसे कहेंगे? इतना ही ज्ञान है, क्या? क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दो का ज्ञान हो गया तो ज्ञानी; और नहीं हुआ या घड़ी-2 माया मुगालते में डाल देती है, अनिश्चय में डाल देती है, तो क्या कहेंगे? ज्ञान हो गया? नहीं हुआ। हाँ; ज्ञान तो नहीं हुआ ना कुछ भी! ये शास्त्र पढ़ना, ये भी भक्ति है। क्या? हाँ। जब तक ये पढ़ते हैं शास्त्र छपे-छपाए तब तक क्या है? भक्ति है कि नहीं है? तब तक भक्ति-ही-भक्ति है। नहीं तो, शास्त्र पढ़ करके वो फिर क्या प्रवचन दिया, तो उसको ज्ञानी कहेंगे? शास्त्र पढ़ करके नहीं। बस जैसे धर्मपिताएँ अपना अधूरा ज्ञान सुनाते हैं तो ओरली सुनाते हैं या किताब पढ़ते जाते हैं, किताब पढ़ते जाते हैं और फिर, फिर सुनाते जाते हैं? कि डायरेक्ट सुनाते हैं? पढ़ते हैं क्या? कुछ पढ़ते तो नहीं। तो जब वो धर्मपिताएँ नम्बरवार होते हैं, वो ही नहीं पढ़ते हैं, वो डायरेक्ट ओरली सब कुछ भाषण देते हैं। पढे़-पढ़ाए नहीं होते हैं कुछ। होते हैं क्या? कोई शास्त्र पढ़े-पढ़ाए नहीं होते हैं। तो वो तो द्वापर-कलियुग के धर्मपिताएँ हैं जिन्होंने द्वापर-कलियुग में आ करके धर्म की स्थापना की और ये, ये ऊँच-ते-ऊँच बाबा कहाँ से धर्म की स्थापना करता है? कौन-से युग से? सतयुग आदि से ही। क्या सतयुग का आदि? हाँ, स्वर्णिम पुरूषोत्तम संगमयुग से। उसको कहेंगे सतयुग का आदि। तो ये पूजा करना, ये पढ़ाई पढ़ना ये सब क्या हुआ? क्या हुआ? भक्ति हुई कि ज्ञान हुआ? अरे, अपन लोग क्या कर रहे हैं अभी? अपन लोग क्या कर रहे हैं? अरे, क्या कर रहे हैं? भक्ति कर रहे हैं ना! अरे, भक्ति कर रहे हैं कि ज्ञानी बन गए? (किसी ने इशारा किया) ज्ञान, ज्ञानी बन गए? अच्छा! तो अब माया वायडोरा नहीं देती होगी? रावण-कुम्भकर्ण सुलाता नहीं होगा? सुलाता है तो काहे के लिए? तो तो माया का वायडोरा पड़ता है ना! क्योंकि कुम्भकर्ण भी तो रावण के अण्डर में होता है कि नहीं? छोटा भाई हुआ ना! हाँ।
[14:00, 7/10/2020] Baba 3: VCD 3279  प्रातः क्लास- 02.03.1968 
 व्याख्या ता. 16.06.2020 
समय:-00:15:30
तो देखो, ये पढ़ना करना, ये पूजा करना, पूजा माना? पूज्य किसको मानते हैं? जैसे बच्ची की शादी होती है, तो माँ-बाप जहाँ शादी करते हैं, उनकी पूजा करते हैं कि नहीं? करते हैं कि नहीं? हाँ, वो पूजनीय हो गए। उनकी पूजा करते हैं, उनकी चिरौरी करते हैं, उनको अच्छा-2 भोजन बनाए के खिलाते हैं, उनकी बहुत आवभगत करते हैं कि नहीं? हाँ। अब करना तो चाहिए एक शिवबाबा की। जो शिवबाबा कहता है- चाहे दुकाल पड़े, चाहे अकाल पडे़, चाहे कोई परिस्थिति हो जाए, तुम बच्चों की मैं परवरिश करूँगा। तुम बच्चे दुखी नहीं हो। कयामत में, कयामत की बात देखो मुसलमान के शास्त्रों में भी लिखी हुई है कि कयामत के टाइम पर अल्लाह ताला अपने बंदो को बडे़ आराम से रखेगा; कि दूसरे कोई रखेंगे? दूसरे कोई जिम्मेवारी लेंगे? दूसरे कोई जिम्मेवारी नहीं (...)। ये तो एक शिवबाबा ही है ..., कितनों को? कितनों को? अरे, जिनकी राजधानी स्थापन होगी उतनों को तो करेगा। कितनों की राजधानी स्थापन होगी? हाँ, तो अभी मालूम नहीं कितनों को पूछ रहे? मालूम भी है, फिर भी पूछते जाते हैं कि देखें इस पढंतरी, जो सामने बैठा हुआ है, बोल रहा है इसको मालूम है कि नहीं? अरे, पढंतरी भी तो भगत है ना! पढंतरी क्या है? पूजा करन्ति क्या है? कोई की पूजा करता है, चिरौरी करता है तो उसकी क्या नाम, क्या होती है? चमचागिरी करता है, मक्खनबाजी करता है कि नहीं? हाँ, तो कोई-2 की मक्खनबाजी करता है, तो इसका मतलब क्या हुआ, पूजा हुई कि नहीं? हाँ, पूजा करता है। तो ये सब भक्ति है। सो ये भक्ति जो है, वो तो सभी शास्त्र पढ़ते हैं भक्ति करने वाले और शिवबाबा कहते हैं- मैं तो कोई शास्त्र पढ़ करके तुमको नहीं सुनाता हूँ। शिव ज्योतिबिन्दु सदाशिव ज्योति जो है, कभी अंधेरा नहीं होता है उस आत्मा में। अंधकार होता है अज्ञान का? होता है? नहीं। तो वो कहते हैं मैं तो कोई शास्त्र थोड़े ही तुमको पढ़ाता हूँ। हाँ। अरे, शास्त्र हाथ में लेके पढ़ाता हूँ क्या? पढ़ाता हूँ? मैं कोई शास्त्र लेके नहीं पढ़ाता हूँ। बेसिक में पढ़ाता था क्या? बेसिक में भी मैं शास्त्र लेके नहीं पढ़ाता। ब्रह्मकुमारियाँ पढ़ाती होंगी। है ना! हाँ; और एडवांस में भी, एडवांस में भी जो अज्ञानी होंगे, भगत होंगे, चाहे अव्वल नम्बर भगत क्यों ना हो जिसने बहुत भक्ति की हुई हो, वो भी पढ़ करके सुनाएगा। अरे, हाथ में ले करके किताब या पुस्तक, कुछ भी, छपा हुआ मैटर या हाथ का लिखा हुआ वो पढ़ करके सुनाएगा कि ऐसे ही डायरेक्ट सुनाएगा धर्मपिताओं की तरह? हाँ, बताओ! (किसी ने इशारा किया) ब्रह्मा बाबा डायरेक्ट सुनाते थे? लो! हाँ, ब्रह्मा बाबा पढ़ेंगे; और, और राम वाली सुनाती है? राम वाली आत्मा सुनाती है? वो याद में नहीं रहती है? बाबा ने कहे कि शंकर क्या करता है? कुछ भी नहीं। अरे, ब्रह्मा वाली आत्मा तो कृष्ण का पार्ट हुआ जो शास्त्रों में भी बताया है। तो जब ब्रह्मा की आत्मा का पार्ट कृष्ण का हुआ, तो शंकर का किसका हुआ? राम का हुआ। तो राम वाली आत्मा सुनाती है, समझाती है, क्लैरीफिकेशन देती है? तो वो सुप्रीम सोल की बात है ना! हाँ। तो बताते हैं- मैं थोडे़ ही शास्त्र पढ़ता हूँ या पढ़ाता हूँ। मैं तुमको आ करके पतितों को पावन बनाने के लिए ज्ञान सुनाता हूँ। क्या? हाँ। ये काम और कोई दूसरी आत्मा करती है क्या अभी? अभी इस दुनिया में कोई दूसरी आत्मा करती है? हाँ, नहीं करती।
[14:01, 7/10/2020] Baba 3: VCD 3279  प्रातः क्लास- 02.03.1968 
 व्याख्या ता. 16.06.2020 
समय:-00:20:35
तो सो भी सिम्पल-2 बातें समझाता हूँ। क्या? वो शास्त्रों में तो कितना तिकड़म भिड़ाई है! बाल में से खाल, खाल में से बाल। तो ऐसे, ऐसे नहीं कि मैं कठिन करके समझाता हूँ। नहीं। बिल्कुल ही सिम्पल, क्या? कि भई अपन को ज्योतिबिन्दु आत्मा समझो। कहाँ? (किसी ने इशारा किया) हाँ। ऐसे नहीं कि तुम ज्योतिबिन्दु आत्मा समझो और कहो कि वो तो सारे शरीर में व्यापक है। नहीं। कहाँ है आत्मा? हाँ, भृकुटि मध्य में है। तो भृकुटि मध्य में जहाँ यादगार बिंदी भी लगाते हैं, पुरूष लोग टीका लगाते हैं, हाँ, पुरूष लोग टीका क्यों लगाते हैं? पुरूष लोग टीका इसलिए लगाते हैं कि पुरूष ही लड़ाई में जाते हैं। क्या? हाँ; और परूषों के लड़ाई में जाने से जीत होगी/ हो सकती है। अगर स्त्रियाँ लड़ाई में जाने लगीं तो क्या होगा? दोनों के बीच में माया घुस पडे़गी कि नहीं? हाँ। फिर वो मिलेट्री-पिलेट्री सब भूल जाती है। हाँ। तो बताया, मैं बहुत सिम्पल करके समझाता हूँ कि अपन को आत्मा समझो। अभी आत्मा तुम्हारी तमोप्रधान बनी है। क्यों? अरे, सुख भोगते-2 इस दुनिया के, दुख भी भोगते-2 तमोप्रधान बनी कि नहीं? हाँ, दुख भोगते-2 भी तमोप्रधान ज्यादा बनने लगी। तो जब आत्मा तमोप्रधान बनती है तो शरीर भी, शरीर भी तमोप्रधान। संग का रंग लगेगा कि नहीं? आत्मा भले अकालतख्त में है। मान लो जिसको कोई काल इस दुनिया में, चारों युगों में खाए नहीं सकता, खा सकता है? नहीं खा सकता। तो बताया, उसका शरीर, वो अकालतख्त भी अभी लक्कड़बुद्धि बना कि नहीं? वोही, तमोप्रधान कहें कि सतोप्रधान कहें? तमोप्रधान हुआ ना? हाँ, तमोप्रधान। तो आत्मा के साथ शरीर भी तमोप्रधान बने हैं। तुम देखो, अभी बाप को याद करो तो इस शरीर के बदली में जो देखते हो, इस शरीर के बदले में जो तुम देखते हो, आत्मा, तो तुम ये आत्मा ही बन जाएँगे। क्या? बाप को याद करते-2 तुम्हारे अंदर वो पावर आ जाएगी कि तुम सदाकाल आत्मा बन जाएँगे और आत्मा की ही स्मृति में रहेंगे। क्या? हाँ। देखो इसने शास्त्र लिखना शुरू कर दिया लम्बा-चौड़ा। क्या लिखा? हाँ, ज्ञान का मंथन करते रहते हैं, उनको तमोप्रधान तो नहीं कहेंगे। अच्छा! ये धर्मपिताएँ नहीं और ये; चलो वो तो धर्मपिताएँ हैं। ये जो विद्वान, पण्डित, आचार्य, संन्यासी हैं ये कुछ मन से सोचते करते नहीं हैं, मंथन नहीं करते? असुरों ने भी मंथन किया या नहीं किया? तो वो भगवान को पहचान लेते हैं? भगवान हो गए? मंथन करने से भगवान हो जाते हैं क्या? नहीं। अरे, मंथन करते हैं इससे तो साबित होता है कि मन के द्वारा मंथन करते हैं, तो उनका मन ज़रूर चंचल तो है। एकाग्र है? एक के आगे है लगातार? नहीं है। तो कहेंगे कि भई अभी वो आत्मा जो है वो सम्पूर्ण आत्मा बनी? कहेंगे? सम्पूर्ण तो नहीं बनी। तो कहते हैं अभी भी जब तक सम्पूर्ण नहीं बनी है, निरंतर ज्योतिबिन्दु की याद नहीं रहती है, आत्मिक स्थिति नहीं रहती है तो अभी तुम बाप को याद करो। वो अभ्यास अभी छोड़ने का नहीं है, अभी और करना है। नहीं करना? हाँ। तो इस शरीर के बदली में जो देखते हो, क्या? तुमको बाबा ने क्या बताया? तुम शरीर को देखो, क्या देखो? आत्मा को देखो। तो इस शरीर के बदले में जो तुम देखते हो, तो तुम ये आत्मा बन जाएँगे। निरंतर बन जाएँगे, सदाकाल के लिए बन जाएँगे या अंतर पडे़गा बीच-2 में? निरंतर बन (...)। अभी क्या होता है? अभी, अभी क्या होता है? अभी याद करने में अंतर पड़ता है कि नहीं? हाँ, अंतर पड़ जाता है।
[14:01, 7/10/2020] Baba 3: VCD 3279  प्रातः क्लास- 02.03.1968 
 व्याख्या ता. 16.06.2020 
समय:-00:26:09
तो तुम देखो, अभी बाप को याद करते रहो। अगर अच्छी तरह से समझ गए हैं और ममत्व मिट गया, काहे से? इस देह से, देह के संबंधियों से, देह के पदार्थों से जो ममता, मोह मिट गया है, पुराने सम्बन्धों से। ये पुराने सम्बन्ध हैं कि नहीं? हाँ, देह भी पुरानी है, देह के सम्बन्धी भी जन्म-जन्मान्तर के पुराने हैं कि नए हैं? हाँ, पुराने हैं। क्योंकि नया सम्बन्ध तुमको चाहिए ना! तो ज़रूर पुराने सम्बन्ध से बुद्धि का योग तोड़ना ही है। क्या? और इस सृष्टिरूपी रंगमंच पर जितने मनुष्यमात्र हैं सबको तोड़ना है या किसी को रह जाएगा? नहीं रहेगा? एक का नहीं रह जाएगा? एक का भी नहीं रहेगा? हाँ। जो एक कहा ना अकालपुरूष! तो वो अकालपुरूष भी जो है उसका शरीर भल रहेगा लेकिन उसमें ममत्व, माया, मोह नहीं रहेगा। तो ये पुराना जो शरीर है जड़जड़ीभूत, बीमार-धीमार, दुखी-रोगी, परेशान होता है कि नहीं? तो इससे सम्बन्ध बुद्धि का तोड़ना है और ये गाते भी आते हैं, क्या? कि बाबा जब आप आएँगे तब हम किसकी भी नहीं बनेंगी। क्या? क्या? क्या पक्का विरूद्ध धारण करेंगी? मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा ना कोई। ऐसे नहीं कोई बुलाने आए तो छम-4 पीछे-2 चली जाएँ। ऐसे करेंगी बिना बाबा से पूछे भी? ऐसे करेंगी? नहीं करेंगी। हाँ, तो मैं जब बाप आप आएँगे तब हम किसकी भी नहीं बनेंगी, ना बनेंगी और ना उनके पीछे भागेंगी। नहीं तो, नहीं तो क्या होता है? बहुतों की बनी हुई रहती है। क्या? ऐसे नहीं कि कोई एक, कोई एक ही होता है जिसके पीछे भाग पड़े। नहीं। बहुतों की बनी रहती। बनी रहती हैं कि नहीं? हाँ। पति की, स्त्री की, चाचे की, मामे की, भाई की, बाबे की, डाडे की, अरे देखो, कितने सम्बन्ध हैं! सब के पीछे भागते हैं कि नहीं? चलो हाथ-पाँव से कभी किसी के पीछे ना भागते हो, बुद्धि भागती है कि नहीं? अरे, मन-बुद्धि भागती है कि नहीं? हाँ, मन-बुद्धि तो भागती है। तो देखो कितने सम्बन्ध हैं! देखो! आत्मा कहती है कि बाबा आप जब आएँगे ना, तो मैं आपसे ही बुद्धि का योग जोड़ूँगी और सब देहधारियों से तोड़ूँगी। तो कितने साल हो गए ये प्रैक्टिस करते-2, कितने साल हो गए अभी? बाबा को आए कितने साल हो गए? बाबा को आए 80 साल से भी ऊपर हो गए। 2 साल और पार हो गए। अच्छा, हम ज्ञान में आए तो हमको भी तो कुछ टाइम हो गया ना! सबका अपना-2, अलग-2 टाइम है।
[14:02, 7/10/2020] Baba 3: VCD 3279  प्रातः क्लास- 02.03.1968 
 व्याख्या ता. 16.06.2020 
समय:-00:30:06
तो बताया कि जबसे तुम ये ज्ञान सुनते आए हो, तो तुम्हारा देहधारियों से बुद्धियोग टूटा है? अनुभव करते हो, टूटा है? कोई नहीं कहेगा हमारा बुद्धियोग और देहधारियों से टूट गया और एक देहधारी से ही लगा हुआ है जिसमें मुकर्रर रूप से शिवबाबा प्रवेश करते। ऐसा है? हाँ, माया पहचानने ही नहीं देती। क्या? पहचानने देती? माया पहचानने नहीं देती, बीच-2 में वायडोरा डालती रहती। तो ये माया बुद्धियोग तोडे़गी, क्या? हाँ, जब तक तुम पक्के नहीं बने हो तब तक क्या करेगी माया? बुद्धियोग तोडे़गी। अब ये करते हैं, देखो भक्तिमार्ग में अंजाम किया हुआ है- बाबा आप आएँगे तो हम आप के ही बनेंगे, और किसी के नहीं बनेंगे। तो सो बाप वो अंजाम, वो तुम्हारी प्रतिज्ञा जो भक्तिमार्ग में तुमने की और अभी भी कर रहे हो, वो अंजाम तुम्हें याद दिलाते हैं अभी संगमयुग पर। जन्म-जन्मान्तर का तुम्हारा ये अंजाम है, ऐसे नहीं कोई एक जन्म का है। एक जन्म का है? एक जन्म का नहीं है। क्या अंजाम है? कि जब आप आएँगे, हम सिर्फ़ आपको ही, आपके साथ ही बुद्धियोग जोड़ेंगे। कि बाबा कहते हैं- मुझे/ मेरे साथ बुद्धियोग जोड़ने से तुम्हारे सब विकर्म, सब पापकर्म जो भी तुमने विपरीत कर्म किए हैं, बाबा ने जो बताए वो सब नष्ट हो जाएँगे। सब भस्म हो जाएँगे मेरी याद से और फिर तुम, फिर तुम क्या बन जाएँगे? फिर तुम ये, क्या? ये लक्ष्मी-नारायण जैसे बन जाएँगे। कैसे बन जाएँगे? ये लक्ष्मी-नारायण आपस में भी एक-दूसरे को देखते, देह को, आँखों को देखते हैं? हाँ, नहीं देखते। तो ऐसे ही तुम भी बन जावेंगे। नहीं बनेंगे? बनेंगे! हाँ। ऐसे बनेंगे माने इन लक्ष्मी-नारायण की जो राजधानी स्थापन होती है, उस राजधानी के तुम भी भाँति बनेंगे या नहीं? हाँ, अतिप्रिय सुख देने वाली जो राजधानी है तुम भी उसके भाँति बनेंगे। तो ये तो तुम्हारी मुख्य एम-ऑब्जेक्ट है। क्या? क्या, मुख्य एम-ऑब्जेक्ट? कि हम भी ऐसे नर से नारायण बनेंगे। नर से प्रिंस नहीं बनेंगे जो गर्भ से जन्म लेना पडे़ बच्चे के रूप में। क्या बनेंगे? नर से डायरेक्ट नारायण, नारी से डायरेक्ट आदिलक्ष्मी जैसे बनेंगे। ओम शान्ति!
[14:04, 7/10/2020] Baba 3: VCD 3279  प्रातः क्लास- 02.03.1968 
 व्याख्या ता. 16.06.2020 
समय:-00:33:46
 जिज्ञासु - वो धर्मपिताएँ जो मंथन करते हैं ना! 
 बाबा - धर्मपिताएँ मंथन करते हैं। हाँ। मंथन करते हैं वो? 
बाबा- तो जैसे डायरेक्ट ...
बाबा- मंथन तो उन्होंने संगमयुग में किया था। कब किया? 
 जिज्ञासु - संगमयुग में। 
 बाबा - 5000 वर्ष पहले जो मंथन किया वो उनकी आत्मा में, क्या? रिकॉर्ड हो गया कि नहीं? हाँ, तो जो रिकॉर्ड हुआ पड़ा है, उन्हें मंथन करने की क्या दरकार? जिज्ञासु - हाँ जी। 
 बाबा - वो सुनाते चले जाएँगे कि मंथन करके सुनाएँगे? 
 जिज्ञासु - सुनाते जाएँगे। 
 बाबा - सुनाते चले जाते! 
 जिज्ञासु - हाँ; लेकिन वो जो मंथन करते हैं वो सही है या गलत है, ये निर्णय करने के लिए उनके अंदर शिव बाप नहीं होते हैं। 
 बाबा - हाँ। 
 जिज्ञासु - यहाँ साकार जो मंथन करता है, तो वो जो भी बोलता है उनका रिस्पॉन्सिबल मैं हूँ ये बताया है ना! 
 बाबा - हाँ। 
 जिज्ञासु - तो वो जो कुछ भी बोलता है उसको शिव बाप साथ में बैठा है अकालतख्त में वो सही कर ही लेंगे ना! 
 बाबा - कर लेंगे, गे-2; लेकिन अभी स्थिति क्या है उसकी? 
 जिज्ञासु - जब मंथन करते हैं तो तमोप्रधान नहीं कह सकते हैं ना बाबा? 
 बाबा - तमोप्रधान नहीं कह सकते? 
 जिज्ञासु - जो विचार सागर मंथन करते हैं वो। 
 बाबा - तो ये किसने कहा कि कर सकते हैं कि नहीं कर सकते हैं, तमोप्रधान कहेंगे? लेकिन ये तो है कि पढ़ाई पढ़ करके, किताब पढ़ करके सुनाते हैं कि वो ज्ञानी बन गए? धड़ाधड़-2 धर्मपिताओं की तरह बोलते जाते हैं? 
 जिज्ञासु - जो किताब पढ़ते हैं वो तो ब्रह्मा बाबा पढ़ते हैं। 
 बाबा - ब्रह्मा बाबा पढ़ते हैं? और ब्रह्मा बाबा पढ़ते हैं तो वो क्या करते हैं जिनका मुकर्रर रथ है? वो क्या करते हैं? 
 जिज्ञासु - याद में बैठते हैं ऐसे बोला है लेकिन सिर्फ़ याद भी। 
 बाबा - अभी तो कह रहे हैं कि वो पढ़ता है, वो ही बोलते हैं ब्रह्मा बाबा। 
 जिज्ञासु - याद भी वही कर सकते हैं जिसके अंदर पूरा ज्ञान हो। 
 बाबा - अरे, तुम याद नहीं कर सकते? 
 जिज्ञासु - निंरतर! 
 जिज्ञासु - पहचान कर याद करना और अभी जितने लोग याद कर रहे हैं, कितने लोग अनिश्चयबुद्धि भी हो जा रहे हैं ना! 
 बाबा - कैसे पता चले कौन है वो इस सृष्टिरूपी रंगमंच पर जो पूरा; ये तो अंदर की बात है। कैसे पता चलेगा किसी को? तुम्हें पता चल गया क्या? 
 जिज्ञासु - वो जैसे 
 बाबा - पता चल गया तुमको? 
 जिज्ञासु - अनुभव करते। 
 बाबा - अनुभव करते! सदाकाल अनुभव करते हो कि माया बीच-2 में अनिश्चयबुद्धि बनाएती है?
[14:06, 7/10/2020] Baba 3: जिज्ञासु - माया बीच-2 में अनिश्चयबुद्धि बनाती है। 
 बाबा - तो तुम निश्चयबुद्धि बना बना ना बना, बराबर हो गया। कख का चोर सो लख का चोर। कि ज्ञान का साहूकार बन गया? नहीं। हाँ। फिर बताओ, राम वाली आत्मा, कुछ लोग तो कहते हैं कि वो भगवान हो गई, वो ही भगवान है। कोई निराकार भगवान कब अलग से होता ही नहीं। और तुम भी कहते हो हाँ, वो भगवान है। 
 जिज्ञासु - शिव बाप रिटायरमेण्ट लिया तो ज़रूर कोई उनके समान कोई-ना-कोई बना होगा तभी तो रिटायरमेण्ट लिया? 
 बाबा - समान बना होगा कि थोड़ा-बहुत जानकार बना होगा, तो थोड़ा-बहुत जानकार होगा तो फिर कुछ-ना-कुछ पढ़ करके सुनाएगा कि नहीं? तो पढ़ करके ही सुनाता है, भक्ति ही कर रहा है कि ज्ञानी हो गया? 
 जिज्ञासु - थोड़ा-बहुत जानकार होगा तो उनके ऊपर शिव बाप अधूरे ज्ञानी को उनकी जगह पर बिठाकर रिटायरमेण्ट लेंगे क्या? 
 बाबा - गें-5! बस बच्चों की तरह गें-7! गें करते रहोगे। गें-2 से काम चलेगा? अभी वर्तमान में क्या स्थिति है? अभी वर्तमान में भगत हैं सब कि कोई ज्ञानी है?
 जिज्ञासु - भगत। 
 बाबा - उसको भगवान मिल गया इसलिए बोल रहा है। मिल गया ना तुमको? अरे चुप! बाबा ने भी कहा सबसे भली चुप। कोई छाती ठोक के कह सकता है कि मुझे भगवान मिल गया। कहते तो बहुत हैं, कोर्स देते हैं तो कहते हैं, संदेश देते हैं तो कहते हैं। कहते हैं कि नहीं? हाँ, लेकिन वास्तव में क्या किसी को मिल गया कि बीच-2 में अनिश्चय पैदा होता रहता है? 
 जिज्ञासु - अनिश्चय पैदा होता रहता है। 
 बाबा - लो! तो फिर वो नीम हकीमे खतरे जान। कैसे, कैसे हकीम बने, कैसे डॉक्टर बने, कैसे वैद्य बने? खतरा पैदा करने वाले नीम हकीम बने या पक्के हकीम बन गए, पक्के वैद्य बन गए, पक्के डॉक्टर बन गए? 
 जिज्ञासु - खतरा पे(...)। 
 बाबा - खतरा(...)। ऐसे ही हुआ ना! और सारे ही ऐसे हैं कि नहीं? सारे ही हैं। अब क्या करें? माताजी तो विचार करने लगीं दोनों अब क्या करें? क्या करे क्या? ये तो निश्चयबुद्धि की परीक्षा है। कौन कब तक डटे रहते हैं। कोई पहले ही भाग खडे़ होंगे, भागन्ती हो जाएँगे और कोई? 
 जिज्ञासु - बाद में। 
 बाबा - कोई? 
 जिज्ञासु - बाद में। 
 बाबा - बाद में भागेंगे। तो ज्यादा नम्बर किनको मिलेंगे? 
 जिज्ञासु - बाद में। 
 बाबा - जो बाद में भागेंगे उनको ज्यादा नम्बर मिलेंगे। और जो पहले भागेंगे? 
 जिज्ञासु - कम। 
 बाबा - उनके नम्बर तो डिक्लेयर हो गए कि भई वो तो माला में नीचे वाले मणके बनेंगे, ऊँचे वाले तो बनने वाले नहीं। चलो!
वार्तालाप प्वाइंट            वार्ता न. 1251

स्टूडेन्ट- ये सप्त स्वर क्या हैं? राधा सप्त स्वर बजाती है।

 बाबा - सात नारायण हैं ना। तो सात नारायण सात प्रकार का ज्ञान सुनावेंगे या एक ही प्रकार का ज्ञान सुनावेंगे?

स्टूडेन्ट - सात। 

बाबा - सात प्रकार का ज्ञान सुनाते हैं तो उनके सात स्वर हो गये। राधा सम्पन्न स्टेज का नाम है, संगमयुगी पुरूषार्थी का नाम है और सरस्वती? सरस्वती किसका नाम है? किसको फालो किया? अधूरे ब्रह्मा को फालो किया तो वो एक ही तार में बोलेगी या सात स्वर में बोलेगी? 

स्टूडेन्ट - एक ही तार।

बाबा - एक ही ब्रह्मा का तार। जो ब्रह्मा ने बोला वो, सो सरस्वती बोलेगी।
समयः-17ः03-18ः08
बाप आकर पढ़ाई पढाते हैं, किसी को डंडे मारते है क्या ? स्थूल डंडे मारते है ? नहीं। बातों के डंडे , जिसके लिए कहा गया है लातों के देवी बातों से नहीं मानती। तो जब तक पढ़ाई का पीरियड है तब तक शांति से पढ़ाई पढ़ाते हैं, जब देखते है कि अब पढ़ाई  पूरी हुई और पढ़ाई जितना पढ़नी थी सबने पढ़ ली, और पहला संगठन डिक्लेयर होता है, और उसके बाद लड़ाई शुरू हो जाती है। जिसने जितनी धारणा की है, उतनी धारणा रह जाती है। और फिर संघर्ष शुरू। संघर्ष के बीच , जिसने जितनी पढ़ाई पढ़ी है उतना ही कामयाब होगा जिसने जितना पुरूषार्थ किया है अपनी आत्मा को स्थिर करने का उतना ही स्थिरयम रहेगा।  नहीं तो हिल  जावेगा। खुद हिलेगा तो राजाई भी हिल जावेगी। कुछ ना कुछ अनिश्चयबुद्धि हो जावेगा।  अनिश्चयबुद्धि होगा तो माला का मणका नीचे खिसक जावेगा।  इसलिए बोला है अनिश्चयते  बुद्धि विनश्यते । विनश्यते का मतलब आत्मा का खल्लासा नहीं होगा। देह खल्लास नहीं हो जावेगी । पद नीचा होता जावेगा।  
Vcd - 327

Thursday, December 26, 2019

ఆధ్యాత్మిక విశ్వ విద్యాలయం లో భాగవతం

ఆధ్యాత్మిక విశ్వ విద్యాలయం లో భాగవతం
మేము ఓక ఆధ్యాత్మిక కుటుంబ సభ్యులం, మాలో అన్నదమ్ములం, అక్కచెల్లెళ్ళం కలిసి షుమారు 20,000 పై చిలుకు ఉన్నాం అందులోనూ కన్యలు మాతల సంఖ్య 80%. మేము దేశ విదేశాల లోని వివిధ ప్రాంతాలనుంచి మూల మూలల నుంచి వచ్చాం. మా మధ్య రక్త సంబంధం లేకపోవచ్చు, కానీ ఒకే విశ్వ పిత సంబంధం కారణం గా మా మధ్య తెగని బంధం ఏర్పడింది. మాలో హిందూ, ముస్లిం, క్రిస్టియన్, సిక్ఖ్ అని లేరు, మా అందరికీ ఒకే బాబా ఆయనే తల్లి తండ్రి ఒకే శరీరం లో అర్ధనారీశ్వరుడుగా. వినడానికీ విశ్వసించడానికి విచిత్రం అయినా నిజం నిరూపించు కోవడానికి అవసరం ఏమిటి. మీరే స్వయంగా వచ్చి ప్రేమతో తెలుసుకుంటే తెలుస్తుంది. మేము అవిచ్ఛిన్న మైన ఆశక్తి కి ఏకతా అనే తాటితో కట్టుబడి ఉన్నాం. పరమపిత పరమాత్మ శివుడు కంపిల్ గ్రామంలో (యూ.పీ.)జగత్పిత జగదంబ రూపంలో ప్రవేశించడంతోనే ఈ అసంభవ కార్యం సంభవమైనది. నిజానికి ఇది ఒక అద్భుతం ఇప్పటి భారతదేశపు పటంలో ఏమాత్రం విలువలేని ఓ కుగ్రామంలో ఎలా దేశపు మూల మూలల నుంచి ఈ దార్శనిక సిద్ధాంతానికి కట్టుబడి ఈ చిన్న గ్రామంలో ఒకటి అయ్యి నిలుచున్నాము. ఈ కుగ్రామంలో ప్రజలకు కనీసం పొట్టనింపుకోవడానికి రెండుపూటల రెండు రొట్టెలకు కూడా గతిలేదు. మేము మిమ్మల్ని కూడా మా కుటుంబ సభ్యులుగా భావించి మీతో ఈ రహస్యాలు పంచుకుందాం అనుకుంటున్నాము.
నిజానికి మేము బ్రహ్మకుమారీ ఈశ్వరీయ విశ్వవిద్యాలయం, మౌంట్ అబూ రాజస్థాన్ ఇంకా ఆ సంస్థ అనేక విభాగాల లో చెప్పబడే జ్ఞానం తో ప్రభావితులమై వారితో కలిసి ఉండేవారం. కానీ ఆశ్చర్యం ఏమంటే పరమపిత శివపరమాత్మ దాదా లేఖరాజ్. బ్రహ్మ మాధ్యమంగా మౌంట్.అబూ లో 1951 నుంచీ 1969 వరకూ చెప్పిన మహావాక్యాలు వీటినే జ్ఞాన మురళీలు అంటారు మరియు 1969 నుంచీ ఇప్పటివరకూ బ్రహ్మకుమారీ గుల్జార్. మోహిని గారి ద్వారా చెప్పిన చెప్పబడుతున్న అవ్యక్తవాణి ల గహన అధ్యయనం లేక మనన చింతనం ఆధారంగా ఎన్నో రహస్యాలు జిగ్జ్ఞాసులనుంచి దాచి ఉంచుతున్నారు. ఆ రహస్యాల ప్రమాణం మూల ఈశ్వరీయ మహావాక్యాల నుంచి తొలగించారు అని తెలుస్తున్నది. జ్ఞాన మురళీలు మరియు అవ్యక్తవాణీల లో ఎక్కడైనా రాముని, శంకరుని, ప్రజాపిత యొక్క విషయం వస్తే ఆ మహావాక్యాలు బ్రహ్మకుమారీ విశ్వవిద్యాలయం, మౌంట్.అబూ ద్వారా ప్రింటు చేయబడినవి నేడు పునః ముద్రితమౌతున్న(రివైజ్)మురళీలలో ఏ కోశానా వెతికినా కనిపించడం లేదు. తొలగించ బడిన ఈ వాక్యాలు శ్రీమత్.భగవద్గీతశ్లోకాల లో రచయిత మరియు రచన రహస్యాలు నేటికీ రహస్యాలై అగుపిస్తాయి. ఇవ్వే మమ్మల్ని ఐతిహాసిక గ్రామం కంపిల్. వైపు ఆకర్షించాయి.
మౌంట్ అబూలో దాదాలేఖరాజ్. బ్రహ్మద్వారా చెప్పిన మహావాక్యాల రహస్య సారం కంపిల్.లో ఉన్న ఆధ్యాత్మిక విశ్వవిద్యాలయం ఉనికి వెలికి తీసింది. మొత్తం లోకంలో ఫరూఖాబాద్. మహాత్మ్యాన్ని చాటిచెప్పింది. ఈ రహస్యాలే మమ్మల్ని జగత్పిత జగదంబ లను క్రమశః మా మాతాపిత ప్రజాపిత, బ్రహ్మ అని తెలుసుకునేలా చేశాయి మరియు మమ్మల్ని ఈశ్వరీయ సేవకు అంకితమయ్యేలా సమర్పితమయ్యేలా చేశాయి. ఈ విధంగా మేము దేశం నలుమూలల నుంచి వచ్చినా అపరిచితులమైనా విభిన్నప్రాంతాల, భాషలవారమైనా ఒకే మనసు, ఒకే వచనం, ఒకే కర్మ కలవారమై అది ఒకే తండ్రి మాటపై ఆధారపడి మాతాపితల ఛత్రఛాయ లో ఒక దివ్య ఈశ్వరీయ కుటుంబం అనే సుత్రం లో కట్టుబడి ఉన్నాం. ఇది కేవలం ఒక విశ్వవిద్యాలయమేకాదు, ఒక ఇల్లుకూడ. ఈ కుటుంబం కేవలం భారత్ లోనే కాదు. విశ్వమంతా వ్యాపించింది. మా లక్ష్యం జాతి, మత, భేదభావాలకు అతీతంగా వసుధైవ కుటుంబం స్థాపన చేయడంలో పరమాత్ముడి సాకార మాధ్యమానికి (బాబాకి) భుజాలమై ఉండడం అంటే సహాయకారులం సదా అవడం. ఇది ఒక సత్సంగం, ఈ కుటుంబం కేవలం ఒకే సత్యమైనవాడు, శివకరుడు, ఒకే శివబాబా సాంగత్యంలో ఒకేబాబా సాంగత్యంలో రంగరించ బడి ఉన్నాం. ఈ కుటుంబం విశ్వంలో విడదీయరాని అతిపెద్ద కుటుంబం వసుధైవకుటుంబంగా ఉద్భూతం కాబోతున్నది. ఈ మా కుటుంబం మాత్రమే ఈశ్వరుని ఙ్ఞానం ద్వారా ఈ కలియుగీ రావణ రాజ్యాన్ని రామరాజ్యంగా మార్చే శక్తి కలవారం. ఆఁ ఐతే స్వర్గీయ స్థితి రావడానికి తప్పక ప్రతీవ్యక్తి మహాభారీ మహాభారత యుద్ధంలో పాల్గోవాల్సిందే. పాండవుల జీవనమే తెలుపుతుంది –అన్ని రోజులూ మనవి కావని.-  

  

Tuesday, December 24, 2019

నాలుగు పేపర్లు

అక్కడ ఆత్మల లోకం ఈ జ్ఞానం లో నలుగు సబ్జక్ట్లు . జ్ఞానము, యోగం, ధారణ మరియు సేవ. జ్ఞానం అంటే తెలియడం. ఏమి తెలియడం నేను ఆత్మ నా తండ్రి పరమ పిత పరమాత్మ శివబాబా ఎవరు అని తెలియడం.  అయన ఏ సాధారణ మానవునిలో ప్రవేశించి ఉన్నారో తెలిసిన తరవాత అయనను స్మృతి చేయడం యోగం, అయన తెలిపే ధర్మం పాటించడం ధారణ మరి సేవ అంటే ఈ జ్ఞానం అర్ధం చేసుకుని ఇతరులకు అర్ధం చేయించడం సేవ. స్మ్రుతి చేసే వారే స్వర్గం లోకి వెళతారు. పదవి కూడా పొందుతారు. స్మ్రుతి చేయడానికి కూడా జ్ఞానం కావాలి ఒక్కరినే తలుచుకోవాలి గీత లో కూడా మామేకం అని మాట వచ్చింది. పురుషార్ధం చేయవలసినవి  జ్ఞాన యోగ ధారణా సేవ అనే నలుగు పేపర్లు . పతితులు పావనం అవ్వాలి అనేక దేహ దారుల సాంగత్యం లో పతితులు ఆయారు ఇప్పుడు ఒక్కరి సాంగత్యం లో పావనం అవ్వాలి.
ప్రయత్నాలు ఎన్నో చేసారు కాని ఎవరూ దేవత కాలేదు. ఆత్మల కనెక్షన్ కేవలం పరమాత్మ తోటే. మనని మనం ఆత్మ అనుకుని పరమాత్మను తలుచు కోవాలి. చైతన్యం ఆత్మ కదా జడ శరీరం ఏమి చేయదు. చైతన్యం అంటే మాట్లాడేది నడిచేది. గుహ్య మైనది జ్ఞానం .స్వర్గం లో కూడా దేహాభిమానం ఉంటుంది. దేహం పేరు పడుతుంది కదా. లక్ష్మి నారాయణుడు, రాధ కృష్ణులు అలా.  కనుక ఈ కష్టం చేయమంటారు. ఏమిటి ఆ కష్టం మనని ఆత్మ అని ప్రాక్టికల్ గ అనుకోవడం  సుఖ ధామం వెళ్ళడానికి ఆత్మ అభిమాని కావాలి కష్టం చేయ కుండ ఏది రాదు. కష్టమే లేక పొతే అన్దరూ విశ్వ మాలిక్ అయిపోవచ్చు. కాని ఒక్కరే విశ్వ నాధుడు అయ్యారు. అయన పరివారం కూడా భూమిపై నక్షత్రాలు భోమ్మీద విశేష ప్రజ్ఞ కల మహిమాన్వితులు పూజించబడే దేవతలు.  జ్ఞానం అర్ధం చేసుకున్న వారికి సులువు. కేవలం విని వదలడం కాదు పాటించాలి. మననం చేయాలి. మాయ అపోజిషన్ చాలా ఉంది. కొంత మంది తలరాత చాల బాగుంది వారు జ్ఞానం యోగ పురుషార్ధం లో లీనం అయ్యారు. లేని వారు దేహ సంపాదనలో మునిగి పోయారు. 
వారు భక్తులు కేవల దర్శనం కోరు కుంటారు. భక్తి లో కష్టం ఉంటె జ్ఞానం లో కూడా ఉంది. తరవాత వచ్చే వారు పురుషార్ధం చేయరు అని కాదు. చివరలో వచ్చినా పురుషార్ధం చేసి ముందుకు వెళ్లి ఫస్ట్ రావచ్చు. మేము పొట్ట సంపాదన వదిలి ఈశ్వరీయ సంపాదనలో ఉంటాము. ఇక్క డ ఆత్మ ఐ కురుచుటాము. ఇది ఆత్మ తపస్సు దేహ తపస్సు కాదు ఉల్టా నిల్చో, ఆసనం వెయ్యి ఇవ్వి కాదు... ఆత్మ తపస్సు ఇక్కడ అక్కడ దైహిక తపస్సు. 
మీరు పవిత్ర్ ఋషులు. ఋషులు అని తపస్వులను అంటారు. ఘోర తపస్సు చేసాడు విశ్వామిత్రుడు అంటారు పెద్ద రాజు కదా. ఇక్కడ ఎక్కడకో వెళ్ళ వలసిన పని లేదు. ఒక్క సెకెండ్ లో దేహం దేహ సంబంధాలు మరిచి ఆత్మ అనుకో....బీతి కో బీతి దేఖో ఏ దునియా న జీతీ దేఖో....... జరిగి పోయింది జరిగి పోయింది. ఈ లోకం చచ్చి పోయింది. అంటే మనకు ఈ లోకం తో పని లేదు..... మన పని ఎవరు ఎలాంటి వారైనా వారికి సహాయం చేయడమే, డబ్బులు ఇవ్వలేక పోవచ్చు  కాని  శాంతి ప్రేమ ఆనందం సుఖం ఇవ్వగలం.   

పంచుకోవాలని ఉంది

ఈ రోజు కొంచం నాక్కూడా ఏదో మీ తో పంచుకోవాలని ఉంది. అందరి సహృదయుల మధ్య మరిచి పోయిన సాహిత్య పిపాస పెంచుకోవాలని ఉంది. చదువరులు లేక ఒంటరి నైన నన్ను మీతో కలుపుకుని ఊహల పల్లకి ఎక్కించిన మిమ్మల్ని కొలుచుకోవాలని ఉంది. (సాంగత్య మహిమ సుమీ)
మహామహుల మధ్య ఏదో ఓ మూల కుర్చుని మీ భావాల మిఠాయి పాకం భోషాణం లో నన్ను నేను మున్చుకోవాలని ఉంది హై బాబోయి హింత క(పి)విత్వం నాకే తన్నుకు వచ్చేస్తోందేమి టని మనసు అద్దం లో నా మొహం చూసుకోవాలని ఉంది.
విషయానికి వస్తే....ఈ రోజు మా గురుగారు చెప్పేరు హిందీ లో "బీతి కో బీతీ సమఝో ఏ దునియా నా జీతీ సమఝో"बीती को बीती समझो, इस दुनिया को न जीती समझो".... అంటే జరిగి పోయింది జరిగి పోయిందనుకో , ఈ లోకం అసలు బతికే లేదనుకో" అని తెలుగులో చెప్పుకోవచ్చు....... ఎందుకో ఈ మాటలు బాగా లోతుగా అనిపించాయి. ఎవరో అన్న మాటలు పట్టుకుని దీర్ఘాలు తీస్తాం కాని జరిగి పోయింది చింతించడం మానేస్తే, అసలు ఈ లోకమే లేదు నేను నా దేవుడు తప్ప అనుకుంటే అంత హాయి లేదేమో.....

Tuesday, November 19, 2019

సందేశం

सर्वेषाम कृते नमस्कारा:
भवन्त: सम्मुखे एकम भगवत: सन्देश: प्रस्तौमि कृपया अवधारणं करोतु. शिव: निराकार:| तस्य लोक: परमधाम:| स: परमपिता अस्माकं, वयं सर्वे तस्य पुत्रा:| वयमपि बिंदु रूप आत्मा: एव| अस्माकं धामं अपि परमधामं एव. तत्तु अस्माकं गृहं. वयं सर्वे अत्र भूमौ अभिनयं कर्तुं अगतवन्त:| 5000 वर्षा: अतीता:| चतुर युगा: गता:| अधुना शिवबाबा अस्माकं गृहं नेतुम आगतवान| समस्त भूमण्डले स्वर्गं स्थापयति| एष कलियुगीय नारकीय लोकं विध्वंसं प्राप्नोति| अतएव अनेके देशे बोम्ब्स (bombs) इत्यादि घोर शस्त्रान एकत्र कारितं मनुष्येण|  भगवानुवाच “हे, वत्सो, आगच्छन्तु, मत्. परिचयं प्रप्नोतु, माम विधि पूर्वकं स्मरतु, तेन भवंत: सर्वे अनेक जन्मना: पाप विमोचनं भवति, आत्मशुद्धि अनन्तरं भवंत: सर्वे अस्माकं गृहं आगंतुम शक्नोति, पश्चात मत्. द्वारा स्थापितं स्वर्गं प्रविष्ठुम अर्हतां प्राप्नुवन्ति. अहं अनेक जन्म राज भाग्यं दातुं आगच्छामि| एक: सामान्य मनुष्ये प्रविश्य भवन्तं सर्वे पुत्र रूपेण स्विकुर्य दिव्य राज योग पाठं पठामि.”
अत: अधुना अस्माकं कर्तव्यं अस्ति तं ज्ञातुं. क: स: यस्मिन शिव: प्रविष्टवान? शिव: यस्मिन शारीर आश्रयं स्वीकृतवान स: एव प्रजापिता ब्रह्मा. यदा वयं प्रजापिता ब्राह्मण: दत्त संतान: भवन्ति तस्य वारसत्वं प्रप्तुम अर्हा: भवितुम शक्नुवन्ति. कं वारसत्वं....ज्ञानं, सम्पूर्ण आयु, अर्योग्यं, ऐश्वर्यं, आनन्दं, सुखं, शांति, 21 जन्मानं स्वर्गे (द्वे युगे सतयुग, त्रेता युगे –स्वर्गे) पश्चात् 63 जन्मानं कृते (द्वे युगे द्वापर, कलियुगे- नरके). प्रजापिता ब्रह्मा अपि शिवस्यैव पुत्र:| स: अपि अधुना वारसत्वं शिवे एव प्राप्नोति. किन्तु प्रजापिता ब्रह्मा अस्माकं शरीरस्य पिता, शिव तु आत्मन: पिता. यदा द्वे मिलिते एव अस्माकं सम्पूर्ण पिता भवति. वयं तं भाजितुं नार्हा:|
तस्य भक्ति मार्गीय चित्रं उपरी दत्तं , किन्तु यदार्ध रूपं तु यदा भवन्त: ॐ शांति मार्गे प्रवेशं कुर्वन्ति तदा प्राप्नुवन्ति. सर्वे जना: सुखिनो भवन्तु.
(टिप्पणी:--- यदि दोष: दृष्ट: क्षम्यताम)
    ఈశ్వరుడు రమ్మని పిలుస్తున్నారు పిల్లలూ మిమ్మల్ని మీరు ఆత్మ అనుకుని నన్ను తెలుసుకుని నన్ను తలుచుకుంటే మీ అనేక జన్మల పాపాలు నశించి మన పరంధామం చేరుకుంటారు. పాపాలు నశించడానికి మూడే మార్గాలు. 1. నన్ను తలుచుకోవడం అంటే సహజ రాజ యోగం ద్వారా అనేక జన్మల పాపలు యోగాగ్నిలో భస్మం చేసుకోవడం 2. గత జన్మలలో మరియు ఈ జన్మలో చేసిన పాపల ఫలితం గ రోగాలు బాధల ద్వారా పాపాలు నశింప చేసుకోవడం 3. ధర్మ రాజు శిక్షల ద్వారా పాపాలు నశింప చేసుకోవడం. 
ఏది సులువు ఒక్క పైసా ఖర్చు లేకుండా నేనెవరో తెలుసుకుని మిమ్మల్ని మీరు ఆత్మ అనుకొంటూ నన్ను స్మృతి చేయడం (ఇదే సహజ రాజ యోగం) ద్వారా పాపాలు యోగాగ్నిలో భస్మం చేసుకోవడం సులువు కదా. నేను మీకు తండ్రిని నా వారసత్వం అయిన అనేక జన్మల స్వర్గ సుఖం ఇవ్వడానికే ఇప్పుడు వచ్చాను. కర్మ బ్రహ్మణులుగా  మిమ్మల్ని ప్రజాపిత బ్రహ్మ పుత్రులుగా చేస్తున్నాను. బ్రాహ్మణుల నుంచి దేవతలుగా నన్ను తలుచుకోవడం ద్వారా అవుతారు. ఈ భూమి ఇప్పుడు నరకం దాన్ని నేను స్వర్గం గ చేసి మీకు వారసత్వం గ ఇస్తాను. ఐతే దానికి మొదటి మెట్టు మిమ్మల్ని మీరు ఆత్మ అనగా వెలిగే చుక్క ఈ మీ భ్రుకుటి లో స్థితులై ఉండాలి. పిదప నన్ను ఏ సాధారణ మానవునిలో ప్రవేశించి ప్రజాపిత బ్రహ్మ ద్వారా మిమ్మల్ని దత్తత తీసుకున్నానో తెలుసుకుని ఆ రధం ద్వారా నన్ను తలుచు కోవడమే రహస్య యోగం. ఎంత సులువు. అంతే తద్వారా నా వారసత్వం అనేక జన్మల శాంతి సుఖం పొందండి. 


Monday, September 2, 2019

స్థాపన సులభం, పాలన, వినాశనం కష్టం

త్రిమూర్తుల త్రికర్తవ్యాలు వాటిలో బ్రహ్మ స్థాపన కొంతైనా సులభం, కాని విష్ణువు ద్వారా పాలన శంకరుని ద్వారా వినాశనం చాలా కష్టం. మనం కూడా ఒక ఆలోచన స్థాపన సులభం, కాని ఆ అనుకున్న దానిని కార్య రూపం ఇచ్చి పాలించడం, దానికి అవసరమైయ్యే రక్షణ ఇవ్వడం, ఎదురయ్యే ఆపదలు నివారించి వినాశనం చేయడం అతి కష్టం.

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ఆధ్యాత్మిక విశ్వ విద్యాలయం ఫరుఖాబాద్. ఉత్తర్ ప్రదేశ్.

ఆధ్యాత్మిక విశ్వ విద్యాలయం ఫరుఖాబాద్. ఉత్తర్ ప్రదేశ్. ఒక సంక్షిప్త పరిచయం ఇక్కడ కింద తేదీలు పుట సంఖ్యలు ఇచ్చినవి గురువు గారి ప్రవచనా...